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CBSE Maithili Language: CBSE पाठ्यक्रम में मैथिली को मिली मातृभाषा की मान्यता

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CBSE ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 1 से माध्यमिक स्तर तक मैथिली भाषा को मातृभाषा विषय के रूप में मान्यता दी है। बिहार सरकार ने इसे मिथिला की सांस्कृतिक पहचान के लिए ऐतिहासिक फैसला बताया है।

पटना/आलम की खबर: बिहार और मिथिला क्षेत्र के लिए शिक्षा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE ने मैथिली भाषा को मातृभाषा विषय के रूप में मान्यता देने का फैसला किया है। अब शैक्षणिक सत्र 2026-27 से CBSE स्कूलों में कक्षा 1 से लेकर माध्यमिक स्तर यानी कक्षा 10 तक मैथिली भाषा पढ़ाई जाएगी। इस फैसले को मिथिला की भाषा, संस्कृति और परंपरा के संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

इस निर्णय के बाद मिथिला क्षेत्र के लाखों छात्रों को अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। लंबे समय से मैथिली भाषा को शिक्षा व्यवस्था में अधिक महत्व देने की मांग की जा रही थी। अब CBSE द्वारा इसे आधिकारिक रूप से पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के बाद मिथिला क्षेत्र में खुशी का माहौल है।

केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री जयंत चौधरी ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सिफारिशों के अनुरूप यह निर्णय लिया गया है। उन्होंने सांसद गोपालजी ठाकुर को भेजे पत्र में कहा कि CBSE पाठ्यक्रम में मैथिली को मातृभाषा विषय के रूप में शामिल किया गया है, जिससे विद्यार्थियों को अपनी भाषा में पढ़ाई करने का बेहतर अवसर मिलेगा।

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार नई शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शुरुआती शिक्षा उनकी मातृभाषा में उपलब्ध कराना है। नीति में कहा गया है कि कक्षा 5 तक और जहां संभव हो, वहां कक्षा 8 तक बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाई कराई जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चे अपनी भाषा में पढ़ते हैं तो उनकी समझ और सीखने की क्षमता बेहतर होती है।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT भी इस दिशा में काम कर रहा है। जानकारी के अनुसार NCERT संविधान की 22 अनुसूचित भाषाओं में पाठ्यपुस्तकों का अनुवाद कर रहा है, जिसमें मैथिली भाषा भी शामिल है। इससे आने वाले समय में छात्रों को मैथिली में गुणवत्तापूर्ण किताबें और अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो सकेगी।

मैथिली भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्रमुख भाषाओं में से एक है। बिहार के मिथिला क्षेत्र के अलावा झारखंड, नेपाल और देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग मैथिली बोलते और समझते हैं। यह भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपरा और साहित्य की पहचान भी मानी जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी भाषा को मजबूत बनाने के लिए उसका शिक्षा व्यवस्था से जुड़ना बेहद जरूरी होता है। अब तक मैथिली भाषा साहित्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक अधिक सीमित थी, लेकिन CBSE पाठ्यक्रम में शामिल होने के बाद इसे राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह मिथिला की सांस्कृतिक अस्मिता और भाषाई गौरव के लिए ऐतिहासिक क्षण है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मैथिली को CBSE पाठ्यक्रम में मातृभाषा के रूप में शामिल किया जाना बेहद स्वागतयोग्य फैसला है।

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि यह फैसला नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और संस्कृति से जोड़ने का मजबूत माध्यम बनेगा।

मिथिला क्षेत्र के सामाजिक संगठनों, शिक्षकों और भाषा प्रेमियों ने भी इस फैसले पर खुशी जताई है। कई शिक्षाविदों का कहना है कि मातृभाषा में पढ़ाई होने से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से अधिक मजबूती से जुड़ पाएंगे।

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम केवल भाषा संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे छात्रों के मानसिक और बौद्धिक विकास पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। मातृभाषा में शिक्षा मिलने से बच्चे विषयों को जल्दी समझ पाते हैं और उनकी रचनात्मक क्षमता भी बढ़ती है।

इस फैसले के बाद स्कूलों में मैथिली पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों और नई अध्ययन सामग्री की जरूरत भी बढ़ेगी। माना जा रहा है कि इससे मैथिली भाषा से जुड़े शिक्षकों, लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

सोशल मीडिया पर भी इस फैसले को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखा जा रहा है। कई लोगों ने इसे मिथिला की संस्कृति और पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने जैसा बताया है। भाषा प्रेमियों का कहना है कि इससे आने वाली पीढ़ियां अपनी मातृभाषा को और बेहतर तरीके से सीख सकेंगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करना बेहद जरूरी है। इससे न केवल भाषाओं का संरक्षण होगा बल्कि सांस्कृतिक विविधता भी मजबूत होगी। मैथिली को CBSE पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

कुल मिलाकर यह फैसला बिहार और मिथिला क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर शिक्षा, संस्कृति और भाषा संरक्षण के क्षेत्र में देखने को मिल सकता है।

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